हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।

सच्चा कलावान्

टॉल्स्टॉय का एक मित्र चित्रकार था नाम था गे। गे ने ईसा से मिलते जुलते चित्र बनाने शुरू किए। उस समय टॉल्स्टॉय ने जो उपदेश उसे दिया, वह ध्यान देने लायक़ है ।

टॉल्स्टॉय ने कहा-''सच्चा कलावान् वही हो सकता है, जिसके हृदय में किसी उपकारक विषय का ज्ञान और चरित्र लबालब भरा हो, और फिर वह बाहर निकलने के लिये ज़ोर मार रहा हो; अर्थात् उस विषय की अपनी जानकारी लोगों को बताने के लिये प्रबल इच्छा उसके हृदय में ज़ोर मार रही हो, जिसको काम में लाना उसको याद हो, फिर चाहे वह लेखक हो, चित्रकार हो, या कोई भी कला का आश्रय लेनेवाला हो। जुदी-जुदी कलाओं के बाहरी रूप जुदे-जुदे होते हैं, पर सबकी जड़ तो एक ही प्रकार की होती है।''

-कृष्णगोपाल माथुर
[आदर्श घटनाओं का संग्रह]

 

 

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